Interventions: HUMAN RIGHTS

भारियाः विकास का वर्तमान परिदृश्य विषय पर राज्य स्तरीय परिचर्चा

“विकास का आदिवासी नज़रिया क्या है?”

30 अगस्त 2017, भोपाल.
स्थानीय होटल रॉयल विलास में ‘‘भारियाः विकास का वर्तमान परिदृश्य”  विषय पर पैरवी, नई दिल्ली व सत्यकाम जन कल्याण समिति, छिंदवाड़ा द्वारा परिचर्चा का आयोजन किया गया, जिसमें भोपाल, छिंदवाड़ा, रीवा, सीधी, होशंगाबाद, ग्वालियर व शिवपुरी की विभिन्न सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधियों ने भागीदारी की। आयोजन में पैरवी द्वारा मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले के पातालकोट क्षेत्र में रहने वाली जनजाति ‘भारिया’पर किए गए एक अध्ययन की रिपोर्ट प्रस्तुत की गई, जिसके परिदृश्य में विभिन्न आदिवासी समुदायों की दशा पर वक्ताओं ने अपनी बात रखी।

पैरवी द्वारा किया गया यह अध्ययन मुख्यतः विकास के संदर्भ में भारिया समुदाय की वर्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थिति व चुनौतियों पर आधारित है। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए पैरवी के साथी व अध्ययन समन्वयक रजनीश साहिल ने अध्ययन आधारित रिपोर्ट प्रतिभागियों से साझा की और कुछ प्रमुख बिन्दुओं पर विस्तार से अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि पातालकोट क्षेत्र के 12 भारिया गाँवों में शिक्षा और स्वास्थ्य सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति में हैं। सभी गाँवों में प्राथमिक विद्यालय तो हैं लेकिन नियुक्त स्थायी शिक्षक, प्रधानाध्यापक सप्ताह में एक या दो बार ही विद्यालय जाते हैं। यह सभी विद्यालय अतिथि शिक्षकों के भरोसे चल रहे हैं। कई जगह यह भी देखा गया है कि स्थायी अध्यापक आने वाले दिनों की अपनी उपस्थिति रजिस्टर में पहले ही दर्ज कर जाते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि अतिथि शिक्षकों को दिया जाने वाला वेतन भी pरदेश की निर्धारित न्यूनतम मज़दूरी से कम है, यह स्थिति शिक्षा के प्रति अतिथि शिक्षकों को हतोत्साहित करने वाली है। इसी तरह पातालकोट में मौजूद किसी भी बालक/बालिका आश्रम शाला में आश्रम अधीक्षक उपलब्ध नहीं रहते, आश्रम चपरासी के भरोसे संचालित हैं। रिपोर्ट के मुताबिक पातालकोट की तीनों पंचायतों में स्वास्थ्य केंद्रों में स्वाथ्यकर्मियों का अभाव है। किसी भी स्वास्थ्य केंद्र में चिकित्सक उपलब्ध नहीं हैं। गैलडुब्बा उप स्वास्थ्य केंद्र में तो स्वास्थ्य केंद्र का चैकीदार बीमारों को दवा व इंजेक्शन देता है।

रिपोर्ट के बारे में बताते हुए रजनीश ने कहा कि सबसे अधिक गंभीर स्थिति तो यह है कि आदिवासी समुदाय के लिए जो शासकीय योजनाएँ संचालित हैं उन तक भी भारिया समुदाय की पहुँच नहीं है। वृद्धावस्था, विधवा, विकलांग जैसी पेंशन योजनाओं के हितग्राही तो हैं, लेकिन उन्हें समय पर पेंशन नहीं मिलती। यहां तक कि उन्हें यह जानकारी भी नहीं दी जाती है कि पेंशन मिलती कितनी है। गर्भवती महिलाओं के अस्पताल में प्रसव को सुनिश्चित करने के लिए लागू जननी सुरक्षा योजना का लाभ महिलाओं को नहीं मिलता है, उल्टे उनसे पैसे वसूल लिए जाते हैं। ऐसी ही कई और सरकारी योजनाओं के अलावा जल, जंगल, ज़मीन, यातायात, जलवायु परिवर्तन, संस्कृति आदि रिपोर्ट में दर्ज कई पहलुओं को रजनीश ने प्रतिभागियों से साझा किया।

परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए एक्शन ऐड की स्वाति कैथवास ने कहा कि विकास की वर्तमान अवधारणा में आदिवासियों के सामने पहचान और गौरव का संकट खड़ा हो गया है। विकास की आधुनिक दौड़ में उन्हें उनके संसाधनों से दूर किया जा रहा है। बीते एक दशक में भारिया समुदाय के लोगों की स्थिति में कोई अंतर नहीं आया है। उनके विकास के लिए जरूरी है कि उनके लिए रोजगार उपलब्ध हो और ऐसा उनके पास उपलब्ध संसाधनों के आधार पर को-ऑपरेटिव्स बनाकर किया जा सकता है।
छिंदवाड़ा के तामिया ब्लाक व पातालकोट के कुछ गाँवों में कार्यरत एकलव्य के नीलेश मालवीय ने कहा कि प्रस्तुत रिपोर्ट में शिक्षा की स्थिति को बखूबी दर्शाया गया है। बड़ी कक्षाओं के विद्यार्थी भी ठीक से किताब नहीं पढ़ पाते, क्योंकि एक तो शिक्षक नियमित रूप से विद्यालय में नहीं जाते दूसरे शिक्षा की वर्तमान पद्धति ग्रोथ को आंकने से दूर होती गई है। इसके लिए हम जो वैकल्पिक पद्धति अपने केंद्रों में अपनाते हैं उसके बाद कक्षावार अलग-अलग ग्रोथ हमें बच्चों में दिखाई दी है।

माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय के रिसर्च फैलो साकेत दुबे ने पातालकोट पर किए अपने शोध के हवाले से बताया कि गौर से देखें तो 60 के दशक के बाद भारिया का विकास नहीं बल्कि हृास हुआ है। उनके पारंपरिक बीज, खेती का पैटर्न, खान-पान, सांस्कृतिक माहौल सबमें बहुत परिवर्तन आ गया है और इसकी वजह है विकास की सभ्य समाज की अवधारणा। हम जिसे विकास मानते हैं उसे भी आदिवासियों पर थोप दिया गया है। आदिवासी समाज किस तरह का विकास चाहता है, यह उससे कभी पूछा ही नहीं गया है। नतीजतन हमने उसे उसकी संस्कृति, संसाधनों व संभावित विकास से दूर कर दिया है।

ग्राम सुधार समिति, सीधी के अरुण त्यागी ने कहा कि आदिवासियों को लेकर नित नयी शब्दावली का इस्तेमाल हो रहा है, जिससे उनके सामने पहचान का संकट उत्पन्न हो रहा है और विकास की वर्तमान प्रणाली ने उनके सामने अस्तित्व का ही संकट ला खड़ा किया है। आदिवासी समुदायों में सामुदायिकता और सहजीवन की परंपरा रही है, जैव-विविधता उनके जीवन का महत्वपूर्ण अंग रहा है, लेकिन विकास के नाम पर यह जैव-विविधता, सामुदायिकता और सहजीवन की परंपरा पर हमला है। उन्हें जंगलों से निकालकर ऐसे स्थानों पर रहने के लिए विवश किया जा रहा है जहाँ उनका अपनी संस्कृति से, अपनी जड़ों से कटना वक्त की बात है। वर्तमान में जहाँ आदिवासी है, वहाँ जंगल है। तथाकथित सभ्य समाज के पास जंगल नहीं बचा। आदिवासियों को जंगल से हटाने और उनके लिए वनवासी जैसी शब्दावली के इस्तेमाल की कवायद इतिहास में से आदिवासी की पहचान को ख़त्म करने की कवायद है।

इन वक्ताओं के अलावा निर्मलदास मानकर ने आदिवासी समुदाय के लिए आबंटित बजट के बारे में बताते हुए कहा कि वर्ष 2017-18 के लिए आबंटित बजट में 13291 करोड़ की कटौती कर दी गई है, इसी से आप समझ सकते हैं कि विकास कार्यों के प्रति गंभीरता कितनी है।

ग्वालियर से आईं सुश्री अनुपम साहू ने आदिवासी समुदाय सहरिया के बारे में बताते हुए कहा कि सहरिया समुदाय दो पाटों के बीच फंस जाने की स्थिति में है। उसे न तो अन्य समाज अपना हिस्सा मानते हैं न ही उसकी कोई आदिवासी पहचान बची है। इस समुदाय की पारंपरिक सांस्कृतिक पहचान लगभग समाप्त हो चुकी है। इसकी वजह है इसे जंगल से विलग करके ऐसे स्थानों पर बसा देना जहाँ इसकी सामुदायिकता संकट में है, क्योंकि इसे टुकड़ियों में बसाया गया है। जहाँ बसाया गया है वहाँ भी न्यूनतम लोगों के पास ही ज़मीन के पट्टे हैं। इनका जीवन स्थानीय राजनैतिक प्रतिधिनियों के भरोसे है। अधिकांश बच्चे प्राथमिक से आगे शिक्षा ग्रहण नहीं कर पाते क्योंकि जीवन की जद्दोजहद और रोज़गार के सवाल सामने होते हैं। टपरिया जैसे कई टोले ऐसे हैं जहाँ प्राथमिक विद्यालय भी नहीं है। आदिवासी परंपराओं के विपरीत सामंती समाज की परंपराएँ इनके जीवन में शामिल हो गई हैं। कई गाँव ऐसे हैं जहाँ महिलाओं को चप्पल पहनने की इजाज़त नहीं है। यदि आदिवासी समाज का विकास यही है, तो यह बहुत ख़तरनाक है।

पीआरएस के साथी योगेश दीवान ने विभिन्न राज्यों के आदिवासी आंदोलनों के उदाहरण देते हुए कहा कि असल में विकास के दो नज़रिये मौजूद हैं। एक वो जो तथाकथित सभ्य समाज और सरकारें आदिवासी पर लागू करना चाहते हैं और दूसरा खुद आदिवासियों का नज़रिया। यह दो बहुत पृथक आयाम हैं। हमने अपना विकास का नज़रिया आदिवासियों पर लागू करने की कोशिश की है,  उनका नज़रिया समझने की या कहें कि आदिवासी समुदायों को समझने की कोशिश ही नहीं की। दूसरी ओर चुनौतियाँ भी कई तरह की हैं। एक तरफ़ तथाकथित विकास और सांस्कृतिकता के नाम पर आदिवासियों की संस्कृति को ख़त्म करने के प्रयास जारी हैं और दूसरी तरफ़ संसाधनों से उनकी बेदखली है, जो आर्थिक सवाल खड़े करती है। आदिवासियों के सामने इस समय सांस्कृतिक और आर्थिक सवाल महत्वपूर्ण हैं। पहचान के सवाल से कहीं अधिक महत्वपूर्ण आर्थिक लड़ाई है, क्योंकि उसके बिना अस्तित्व की कल्पना नहीं की जा सकती और गरिमापूर्ण जीवन व सहभागिता का जीवन भी उसी आधार पर सुनिश्चित होगा।
 

अध्ययन रिपोर्ट - भारिया: विकास का वर्तमान परिदृश्य

Human Rights

PAIRVI works with grassroots organization to protect human rights, promote internationally accepted standards of human rights and monitor human rights conditions. It works to strengthen peoples capacity to respond to human rights challenges and improve human rights infrastructure.