खुदरा व्यापर में विदेशी निवेश

सरकार नव-उदारवादी नीति की राह पर चल रही है और विदेशी निवेश का बढ़ावा इसका प्रमुख हिस्सा है. देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति के मद्देनज़र ,एफडीआई को प्रमुख समाधान के रूप में देखा जा रहा है. खुदरा व्यापर अब तक अनछुआ था लेकिन एक ही बार में सरकार ने 51 प्रतिशत विदेशी निवेश की अनुमति दे दी है जिससे देश के लगभग 4 करोड़ खुदरा व्यापारियों के सामने गंभीर संकट पैदा हो गया है.

Agriculture and Climate Change; Peasant Farming in Crisis

Climate change is not only an environmental issue but a defining problem for generations to come which can slow down the pace of progress towards sustainable development either directly or through increased exposure to adverse impact or indirectly through erosion of the capacity to adapt.

भारिया: विकास का वर्तमान परिदृश्य

मध्य प्रदेश के ज़िला छिन्दवाड़ा के पातालकोट क्षेत्र में रहने वाली आदिम जनजाति भारिया की स्थिति विभिन्न पहलुओं पर चिंताजनक है. ख़ासकर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार के संबंध में. जैसे कि पातालकोट के विद्यालयों में शिक्षकों का अभाव है. क्षेत्र में चिकित्सक नहीं हैं, नतीजतन रोगियों की मृत्यु तक की गंभीर स्थितियाँ निर्मित हो जाती हैं. मार्च-अप्रैल में रोज़गार के लिए अस्थायी पलायन के कारण गाँव सूने हो जाते हैं. इसके अलावा जलवायु परिवर्तन और जल-जंगल-ज़मीन से जुड़ी दुश्वारियाँ भी भारिया समुदाय के जीवन का हिस्सा हैं.

दिव्यांग बच्चे और शिक्षा; वर्तमान परिदृश्य, प्रयास व चुनौतियाँ

मध्य प्रदेश के ज़िला भोपाल में दिव्यांग बच्चों की शैक्षणिक स्थिति पर पैरवी, नई दिल्ली व निवसिड बचपन, भोपाल की रिपोर्ट. वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में दिव्यांग बच्चों की स्थिति जानने के लिए की गई इस फैक्ट फाइंडिंग में जो तथ्य निकलकर सामने आए वह इन बच्चों के प्रति हमारे सामाजिक दृष्टिकोण, राजनैतिक व संस्थागत ज़िम्मेदारी व प्रयासों में गंभीरता की कमी को प्रदर्शित करते हैं.

उत्तर प्रदेश, भूमि सुधार और वंचित वर्ग

उत्तर प्रदेश जनसँख्या के हिसाब से देश का सबसे बड़ा राज्य है. आर्थिक व सामाजिक जनगणना 2011 के अनुसार उत्तर प्रदेश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा कृषि-भूमिहीन है और इन भूमिहीन परिवारों में अधिकांश दलित व वंचित समुदाय के परिवार हैं.

Human Rights in the Cold in the Coal Capital

Report of the independent Fact Finding Committee in the matter unlawful arrest and detention and custodial torture leading to the death of Akhilesh Shah, custodial torture of Sanjay Shah, and death of Naqeeb Ahmad Siddiqui due to uprovoked police firing in Singrauli, Madhya Pradesh, in December 2013.

Working of Malnutrition Treatment Centers
An Assessment of MTCs in Rajasthan

This report develops an analysis of the situation from field perspectives, to screen the performance of MTCs in treatment of severe acute malnutrition and raise major gaps in management of malnutrition.

Jharkhand MTCs Assessment

India is home to 40 percent of the world’s malnourished children and 35 percent of the developing world’s low-birth-weight infants; every year 2.5 million children die in India, accounting for one in five deaths in the world. More than half of these deaths could be prevented if children were well nourished.

सरकारी योजनाएं: हमारे मुद्दे

भारतीय संसद के 15वें लोकसभा चुनावों के कार्यक्रम की औपचारिक घोषणा निर्वाचन आयोग द्वारा कर दी गई है. किसी भी लोकतंत्र की दृढ़ता इस तथ्य से परिलक्षित होती है कि उस लोकतंत्र के नागरिक कितने सशक्त हैं. नागरिकों की लोकतांत्रिक व्यवस्था में सहभागिता जितनी अधिक होगी, उस देश का लोकतंत्र भी उतना ही सशक्त होगा.

रोज़गार अधिकार मंच (संक्षिप्त रिपोर्ट)

बिहार और झारखण्ड में नरेगा की वर्तमान स्थितियाँ चिंतनीय हैं. इन्ही स्थितियों को केंद्र में रखते हुए एक लम्बे अरसे से इस बात की आवश्यकता महसूस की जा रही थी कि नरेगा के सफल क्रियान्वयन को मज़बूत करने के लिए कोई सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता है. इसी का परिणाम है पैरवी, नई दिल्ली की पहल पर बिहार-झारखण्ड की विभिन्न संस्थाओं द्वारा रोज़गार अधिकार मंच का गठन.

नरेगा में भुगतान की स्थिति: एक शोध

ग्रामीण भारत में आजीविका की सुरक्षा के मद्देनज़र राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी अधिनियम एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है. परन्तु पिछले अनुभव और गंभीर अनियमितताओं की निरंतर आने वाली ख़बरें यह प्रश्न उठाते है की वास्तविक स्वरूप में नरेगा किस हद तक लोगों को आजीविका और सुरक्षा प्रदान कर रहा है.

Human Rights concerns and Challenges in Bihar

A state consultation was organized by Pairvi and NIDAN on "Human rights concerns and challenges in Bihar" which was held on 20th December 2008, SCADA Business centre, Patna, Bihar.

Elect to End Atrocities

In India, every day 27 atrocities, 13 murder, 5 home or possesion burning, 6 kidnap/abduction, 3 rape, 11 beating cases take place against dalits. In every 18 minutes a crime take place against the dalits. This is not only a crime against a faceless, powerless and defenseless dalit, but a crime against the community, nation and humanity.

उत्तर प्रदेश में दलित

व्यक्तिगत स्तर पर या वर्ग विशेष का उत्पीड़न विकासशील एवं विकसित दोनों ही प्रकार के देशों में लम्बे अरसे से चिंतन के लिए एक गंभीर मुद्दा रहा है. विभिन्न सामाजिक असमानताओं और शक्ति विभाजन के ढांचे की मौजूदगी के कारण भारतीय समाज की संरचना उत्पीड़न के अनुभवों और शोषित वर्ग के जीवन को समझने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान प्रदान करती है.

राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी योजना

अधिकारों की प्राप्ति में गरीबी सबसे बड़ा बाधक है. कीन्स के सिद्धांतों पर आधारित गरीबी उन्मूलन प्रयास लोगों को रोज़गार के अवसर प्रदान करके उन्हें गरीबी रेखा से ऊपर लेन पर केन्द्रित रहे हैं. हालाँकि ऐसा नहीं माना जा सकता की रोज़गार अन्य अधिकारों की प्राप्ति की कुंजी या गारंटी है लेकिन इतना अवश्य कहा जा सकता है कि रोज़गार अन्य अधिकारों के उपभोग की संभावना को अवश्य प्रबल करता है...

Emancipation of Bonded Labour:  Still a Far Cry

A Field Report from  Santhal Pargana (Jharkhand)
In the beginning of 1980s, The Lok Samiti, an off-shoot of the Bihar Movement, had taken up a programme of identification and release of bonded labourers, in terms of the Bonded Labour System Abolition Act, 1976, in Deoghar, Mohanpur...

Reclaiming Dignity, ensuring inclusive development; The Struggle for Dalit Human Rights in India

India in 2007 will celebrate its 60 years of Independence showcasing its liberation from colonial powers and enjoying the freedom of expression and movement. Unfortunately, the free and independent India even after decades of achieving independence still remains stuck to the age old traditional practices of...

Mainstreaming Human Rights Based Approach; Experiences & Challenges

The three day workshop was organized to discuss and develop a common understanding of the human rights based approaches. A significant component of the workshop/discussions was also to have their experiences of mainstreaming human rights based approach.

State of Child Rights in India

The CRC rights to survival, protection, development and participation serve as the four broad indicators along which the profile has tried to map the status of child rights in the country as well as the abovestated states.

Status of Human Rights in Jharkhand

This report should serve as an instrument to bring the various sections of the society together and make them commit with renewed vigour to accomplish everything that still must be done to ensure the realization of human rights.

Status of Human Rights in Rajasthan

This report is an analytical as well as categorical study of the status of Human Rights in the State of Rajasthan. It could also be said to be an eye opener to the government as well as the State Human Rights Commission as to the deteriorating conditions of theHumanRightsintheState.

Status of Human Rights in Uttaranchal

In furtherance of the faith in fundamental human rights reaffirmed by the people of the state of Uttaranchal, India, we are delighted to present before you a report on the scrutiny of the status of Human Rights in the state of Uttaranchal.

Child Marriages in Madhya Pradesh; An Incessant Infringement of Rights

A Rapid Assessment of Child Marriages in Bhind, Morena and Gwalior Districts of Madhya Pradesh (2009). This report is result of combined efforts of a number of individuals and organizations.

हस्तक्षेप (एडवोकेसी मैन्युअल)

अगर आज हम अपने आप को सभ्यता के शिखर पर पाते हैं तो शायद सारा श्रेय उनको जाता है जिन्होंने समाज को नई दिशा प्रदान करने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. समाज में व्याप्त कुरीतियों और शोषण के ख़िलाफ़ ऐसे लोगों ने हमेशा अपनी आवाज़ बुलंद की है, शोषित वर्ग के पक्ष में शोषण करने वाली शक्तियों को चुनौतियाँ दी हैं. अतः एडवोकेसी कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो कि नई हो या जिसे लोग जानते न हों, बस फ़र्क इतना है कि इस दौर में जनविरोधी ताक़तों ने अपना मायाजाल इस प्रकार फैला रखा है कि...

MAUSAM (November 2015)

This issue of Mausam focuses on India’s Intended Nationally Determined Contribution (INDC) submitted to the UN Climate Convention in early October. We think it was not nationally determined, however. Nor does it contribute in any way towards solving the climate crisis: if anything, it can only help worsen the crisis.

MAUSAM (April-June 2015)

People all over the world concerned about ecological crises have been emboldened by a remarkable statement from an unusual quarter: the recent statement by Pope Francis, the head of the Roman Catholic Church, which draws our attention to the systemic roots and causes underlying a range of contemporary ecological crises.

MAUSAM (January-March 2015)

In May 2014, the government in India changed. The NDA (National Democratic Alliance) government led by the BJP (Bharatiya Janata Party), while taking its seat in Delhi, took a swipe at the issue of climate change by extending the name and apparent responsibility of the Ministry concerned with environment and forests (MoEF) to Ministry of Environment, Forests and Climate Change (MoEFCC).

MAUSAM (January-March 2014)

In the floods in Uttarakhand and other parts of the Northern Himalayas in June 2013, we have just witnessed one of the worst climatic disasters (hugely magnified by human mal-design) in Indian history and seethed in frustration at the total unpreparedness and...

MAUSAM (October-December 2013)

In Uttarakhand and the Cyclone Phailin, we have witnessed this year the unusual occurrence of two severe rainfall events: The first meant the tragic and also criminal loss of thousands of lives, and both badly affected untold number of livelihoods.

MAUSAM (July-September 2008)

Isn’t it time that people’s movements, citizens and civil-society initiatives in India include climate in their agenda? Isn’t it time that we demystify the subject and ensure that any ‘green’ and ‘scientific’ exclusivity no longer shrouds the climate crisis—and related ‘issues’ like global warming, biofuel, and carbon trade?

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