Really! Is it true? – Combatting Fake News

Really! Is it true? – Combatting Fake News

Excerpt: In the digital age where information can be easily spread and shared through social media and other online platforms, the ease of sharing and the lack of fact-checking has made it easier for false information to spread rapidly and widely, which can lead to serious consequences. One of the biggest challenges with fake news is that it can be difficult to distinguish from real news, and can often appear to be credible to the average reader. This is compounded by the fact that many people tend to believe information that aligns with their existing beliefs and biases, which can make it difficult to correct misinformation once it has spread. Download
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Visual Media in Public Advocacy

Visual Media in Public Advocacy

Excerpt: Visual media refers to any form of media that is primarily visual in nature, using images, graphics, videos, or animations to convey information, tell a story, or communicate a message. It encompasses various mediums such as television, film, photography, advertising, graphic design, digital art, and more. Visual Media is a particularly effective tool for public advocacy because it can evoke emotions, capture attention, and convey complex message in a concise and engaging manner. Download
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मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले में स्कूल ड्रॉपआउट की स्थिति; एक तथ्यान्वेषण

मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा ज़िले में स्कूल ड्रॉपआउट की स्थिति; एक तथ्यान्वेषण

Excerpt: कोविड महामारी के बाद ऐसी कई रिपोर्ट आईं जो दर्शाती हैं कि इस महामारी के कारण केवल स्वास्थ्य की ही हानि नहीं हुई है बल्कि कई अन्य सामाजिक-आर्थिक क्षेत्रों में भी हानि हुई है। इन्ही में से एक क्षेत्र शिक्षा भी है। कई रेपोर्ट्स ने इस बिन्दु को रेखांकित किया है कि कोविड के कारण लोगों की शिक्षा तक पहुुँच प्रभावित हुई है। खासकर गरीब या कम आय वाले परिवारों के बच्चे शिक्षा से दूर हुए हैं। शुरुआत में इसी बिन्दु को ध्यान में रखकर मध्य प्रदेश के छिंदवाड़ा जिले में कोविड के बाद स्कूल से ड्रॉपआउट हुए बच्चों की स्थिति जानने का विचार किया गया। चूंकि छिंदवाड़ा जिले से बड़ी संख्या में प्रवासी मजदूर हर साल कुछ महीनों के लिए नजदीकी शहरों व राज्यों में जाते हैं तो…
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जीवन और संघर्ष: उत्तर प्रदेश में ट्रांसजेण्डर की स्थिति और अधिकार

जीवन और संघर्ष: उत्तर प्रदेश में ट्रांसजेण्डर की स्थिति और अधिकार

Excerpt: सामाजिक ढांचे में जेण्डर या लैंगिक पहचान एक महत्वपूर्ण मुद्दा है। इस पहचान को सामाजिक मान्यताओं ने दिनों-दिन पुख्ता किया और समाज जेण्डर को स्त्री-पुरुष की ‘बाइनरी’ में ही देखने व समझने का अभ्यस्त रहा है। इस अभ्यास के कारण ही समाज में थर्ड जेण्डर को लेकर जो धारणा बनी, वह उनकी पहचान पर भी संकट पैदा करने वाली रही, क्योंकि वह प्रचलित बाइनरी से बाहर थे। इस पहचान को लेकर थर्ड जेण्डर समुदाय लम्बे समय से संघर्ष कर रहा है, यह संघर्ष सामाजिक और संवैधानिक दोनों स्तरों पर चल रहा है। ट्रांसजेण्डर हमारे समाज के सबसे उपेक्षित वर्गों में से एक हैं, जिनके मानवाधिकारों का उल्लंघन प्रतिदिन होता है। पहचान के लिए समाज की स्वीकृति और संवैधानिक मान्यता दोनों बहुत जरूरी है। एक ऐसे समय में जब हाशिये…
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श्रम संहिताएं; सुधार और शिकायतें

श्रम संहिताएं; सुधार और शिकायतें

Excerpt: भारत में बीते 18-20 साल से श्रम कानूनों में सुधार की कोषिषें की जा रही हैं, ताकि उन्हें मौजूदा कार्यस्थलों, कामगारों और कार्य की प्रकृति के अनुरूप किया जा सके। साथ ही संगठित या असंगठित दोनों क्षेत्रों में काफी हद तक एकरूपता लाई जा सके। इसके लिए विभिन्न सरकारों ने कोषिषें की हैं, लेकिन मुष्किल यह है कि देष में श्रम कानूनों का इतिहास जितना पुराना है, उतने ही पुराने कानून भी आज तक चलन में हैं। 1923 का कर्मचारी मुआवजा अधिनियम हो या 1936 का मजदूरी भुगतान कानून या फिर 1948 के कर्मचारी राज्य बीमा अधिनियम और कारखाना अधिनियम इसके उदाहरण हैं। बीते तीन दषकों में भूमंडलीकरण के बाद तो देष में कर्मचारियों और नियोक्ताओं के बीच के संबंधों में तेजी से बदलाव आया है। इन्हीं बदलावों को…
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